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Saturday, April 17, 2010

पिता और मेरे सपने












सारी दुनिया ,लेखक कवि वृन्द
सब गाते है माँ की महिमा
मै भी नतमस्तक हूँ
देवी प्रतिमा के आगे
कहीं चुभता मन में एक शूल
पिता की अनदेखी कर
हो न मुझसे कोई भूल
पिता जो मेरे घर की धुरी
माँ के हाथों की चूड़ी हैं
रोज़ शाम उनकी राह तकती हूँ
आकर मुझे सुलाते है
पर उनकी आँखों में नींद कहाँ
मेरे सपने पूरे करने की उधेड़बुन में
सारी रात
टाइप राईटर से आँखे चार करते हैं.

Friday, December 4, 2009

धरती का सुहाग बना रहे !

इंतज़ार रहता है
उसे सावन का
महीनों राह तकती है वह
बिजली कड़कने की
बादल के गरजने की
ख़ुद प्यासी रह कर
सबकी प्यास बुझाती है
बदरंग सी
मैली चादर को
हरी भरी चुनर में बदलने का
इंतज़ार रहता है उसे

मुआ सावन है कि
आँख मिचौनी करता है
तरसाता है,
जब आता है तो उसका
अंग -अंग मुस्काता है
नदियों की कलकल उसमें
मादकता भर जाती है
सावन की बुँदे
माथे पर
बिंदिया लगा
सिंगार कर जाती है
उसे विधवा होने से बचा लो
पेड लगाकर प्रकृति
पृथ्वी को सुहागन बनी रहने दो.