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Thursday, April 1, 2010

क्या आपने ग़ुस्से,बैर,और जलन का भी इयर एण्डिंग कर दिया ?

मार्च आते ही सरकारी, प्रशासनिक, व्यापारिक यंहा तक की आम दफ्तरों एवं छोटी-मोटी दुकानों में साल भर के लेखे -जोखे देखने की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है.सभी व्यस्त रहते है अपनी वित्तीय स्थिति का अवलोकन करने में ,नफ़ा -नुकसान जांचने में,लेनदारी -देनदारी निपटाने की उधेड़बुन में ...........


भारतवर्ष में हिन्दू मान्यता के अनुसार दिवाली की रात्रि को लक्ष्मी पूजन के साथ होता था..." था" इसलिए क्योंकि अब तो सभी मार्च में ही क्लोजिंग करते है॥आज रेडियो मिर्ची पर एक आर।जे. को इस क्लोजिंग शब्द की नई परिभाषा देते हुए सुना .लगा की आज की युवा पीढ़ी ऐसा सोचती है तो अवश्य ही उसमें अभी भारतीय संस्कार जीवित है.बुजुर्गों की दी हुई सीख आज भी कायम है... हमारे नेतिक मूल्य आज की "वॉव...कूल " वाली संस्कृति से ऊपर है.उसकी चर्चा वित्तीय मसलों पर न होते हुए भावनात्मक पहलु लिए हुए थी ... सार यह था कि क्यों न हम वर्ष भर में हुए किसी के प्रति अपने मन में पाले हुए बैर के ,गुस्से के,जलन के खाते को भी बंद कर दें. इस बात का लेखा जोखा रखे कि हमसे कंहा गलती हुई है.कितने ऐसे कार्य किये है जिनसे किसी को फायदा हुआ हो. गलती कें लिए क्षमा मांगे और सद्कार्य के लिए सोचे कि आगे भी ऐसा ही करते रहे. आत्मावलोकन करें कि हम अपने लक्ष्य के प्रति कितने सचेत है...गंभीर है... अपने कर्तव्यों से मुँह तो नहीं मोड़ा है...


चूँकि मुझे आंकड़ों से मोह नहीं है तो उसकी भाषा भी नहीं आती है। भावना को अभिव्यक्त देने में सहज महसूस करती हूँ वेसे यह भावनात्मक अवलोकन वार्षिक रूप से जैन धर्म में संवत्सरी पर्व के रूप में तो हिन्दू धर्म में विजयादशमी एवं मुस्लिम परिवारों में ईद का स्वरूप लिए होता है॥ आज जरुरत इस बात की है कि मन इस बात लिए हमेशा सचेत रहना चाहिए ...कि हमसे कोई ऐसी भूल न हो जिसके लिए क्षमा भाव भी कम पड़ जाए ...हम अपनी स्वतंत्रता का नाजायज फायदा तो नहीं उठा रहे है... अपनी बात कहने का अधिकार सबको है परन्तु इसका अतिक्रमण न करते हुए प्रतिक्रमण करे .स्वयं विचारे कि कहीं कोई त्रुटी न हो आगे आने वाले वर्ष में कुछ अच्छा करने का प्राण लें .


अच्छा यही है कि हम इस अकांउट्स के इयर एण्डिंग के साथ अपने सदव्यवहार,सौजन्यता,अपनेपन,अच्छाइयों और सदगुणों की बैलेंस शीट भी बना लें और और नए वर्ष में मन के खातों में सद्कार्यों का अकाउंट खोककर नई शुरुआत करें ..

Saturday, February 27, 2010

आओ मिटा ले दिल के मलाल,आपके माथे पर प्रेम का गुलाल



होली का त्योहार आने को है । रंग –बिरंगा त्योहार होली । टेसू पलाश की महक मौर से लदे आम के पेडो पर कूकती कोयल , रसोई से आती लजीज पकवानो की ख़ुशबू,गुलाल रंग अबीर से सजा इन्द्रधनुष, हुड़दंग मचाती बच्चों की टोली,पकी फ़सलों को देख किसान के चेहरे पर उभरती ख़ुशी ,गाँव की बालाओं की होली खेलने की आतुरता.सभी कुछ मिलकर माहौल को रंगीन और खुशनुमा बना देते है। शीत ॠतु का जाना और ग्रीष्म ॠतु के आगमन बीच ॠतुराज बसन्त उत्साह उमंग ले कर आते है। प्रकृति भी अपने सारे रंग बिखेर कर रख देती हैं नव-पल्लव,नव-अंकुर,नव-जीवन के इस वातावरण में हम भी उत्साह उमंग और मस्ती से भरकर रंग गुलाल अबीर उडाते हैं ,पर ये उत्साह और मस्ती कुछ गुम सा होता जा रहा है,मेरे शहर मे तो एक कहावत सी चल पडी है किसी भी त्योहार का मज़ा लेना हो तो पुल पार (यानी शहर का पुराना भाग जिसमें ज़्यादातर मध्यमवर्गीय परिवार रहते हैं )जाओ। ऐसा क्यों होता है कि जैसे-जैसे हम उन्नति करते जाते है भौतिक रुप से सम्पन्न होते जाते हैं,हम अपने मे ही सिमटते जाते है;विरासत और परम्परा से दूर हटते जाते हैं ?

पहले होली का स्वरुप कुछ अलग होता था। पूजा होती , फ़ाग उत्सव होता था , हुरियारों की टोलियाँ निकलतीं,झूम झूम कर गीत गाए जाते...(तब होली का फ़िल्मीकरण नहीं हुआ था )हर कोई होली के रंग मे रंग जाता था। रंग में भंग ना पड़े इसलिए दादी माँ कई पकवान (श्रीखण्ड, मीठी –नमकीन पुडी,दही-बडे,ठंडाई )एपहले से ही बना कर रख देती थी ताकि घर की महिलाएँ इस त्योहार में पूरे उल्लास से सम्मिलित हो सकें.

मुझे होली के रंग से रंगे–पुते चेहरों से बहुत डर लगता था। पापा,चाचा के आते ही मैं दादी माँ के पीछे छुप जाती थी। मुझे याद है जैसे ही आस–पास के किसी घर में ज़ोर से दरवाजे भड़ीकने (पीटने) की आवाज आती तो पता चल जाता कि उनके घर होली शुरु होने वाली है और मैं डर के मारे काँपती रहती,पेट में अजीब सी गुड्गुडी होने लगती,ज़रा सी कोई आहट होती तो लगता आ गये हुरियारे और उनकी हुड़दंग . हमारे घर के सामने एक परिवार रहता था,उनके यहां दामादजी अपने ससुराल मे सलहज को होली खिलाने के लिये आते थे। भाभी अगर दरवाजा नहीं खोलती तो बेचारे दामाद खिड्की से कुदकर घर मे घुस जाते,”बुरा ना मनो होली है” कह कर घर भर को रंग देते, और पूरा घर उनसे बचने की कोशिश करता.इस कश्मकश मे खूब शोर होता, भागदौड़ मचती और वह नज़ारा जमता कि मेरा मन होता कि मैं भी इस धमाल में शामिल हो जाऊँ.लेकिन बन्द कमरे मे से सिर्फ़ आवाजे ही सुनाई देती थी . शाम को नल मे पानी आने का वक्त होने पर ही मैं कमरे से बाहर आती थी,तब सब नहाते और फ़िर बाजार जा कर ठ्न्डाई पीते थे। एक बार माँ ने ग़लती से भांग वाली ठ्न्डाई पी ली थी उसके बाद माँ ने परदादी से पूछ कर घर मे ही ठ्न्डाई बनानी शुरु कर दी. आज भी वो ठ्न्डाई बहुत याद आती है माँ से रेसेपी भी ली पर माँ के हाथ का वह स्वाद नही आता है.शायद तब की ठ्न्डाई मे उस माहौल की मस्ती,हुड्दन्ग ,रंग ,गुलाल का स्वाद भी रहता होगा। और ज़रूर रहती होगी वह आत्मीयता जो मध्यमवर्गीय परिवेश में भी अपनेपन से लबरेज़ होती थी.

हाँ एक बात और याद आ गई.... जब शाम को सब लोग बदरंग से दिखते;मैं गर्व से फ़ूली न समाती,क्योंकि मैं साफ़ सुथरी और गोरी दिखती बाकी लोग रंग न निकल पाने की वजह से रंगेपुते दीखते तो अजीब सी खुशी होती. आज नज़रें उन्हीं बदरंग चेहरों को ढूँढती है जो आजकल गुम से हो गए हैं । उन पर होली के रंगो के बजाए कुछ दूसरे ही रंग दिखाई देते है,कोई नफ़रत का ,दुश्मनी का, ईर्ष्या,तमस और तनाव तथा हैवानियत का रंग लगाए हुए चेहरे। अब इन रंगे पुते चेहरो से डरकर घर मे बन्द होना पड्ता है,

लाल, गुलाबी, हरा, पीला ,नीला, काला यह रंग ही नहीं और भी रंग हमारे जीवन को रंगीन बनाते है,दोस्ती का रंग, प्यार का रंग, अमन का रंग , भाईचारे का रंग,दुख़ –दर्द बाँटने का रंग । जब इन दिनों समभाव और सौजन्य के जज़बात फ़ीके नज़र आने लगे हैं तो होली भी कभी कभी निहायत औपचारिक लगने लगती है ।यह भी देखने में आ रहा है कि हम घर से बाहर निकल ही नहीं रहे हैं.गुनगुनाना नहीं चाह रहे हैं..प्यार भरी ठिठोलियाँ बिसराते जा रहे हैं...किसी घर में कोई ग़मी हो गई है तो उसके घर जाकर सांत्वना नहीं देना चाह रहे हैं.....गली,मोहल्ले और कॉलोनी में किसी के माथे पर गुलाल लगाना नहीं चाहते.इसी बेरूख़ी की वजह से बहुत औपचारिक से होली-मिलन समारोह चल पड़े हैं.सजावटें,डीजे सिस्टम्स और महंगे व्यंजनों के स्टॉल्स.हमें चाहिये कि आज जब पानी की किल्लत की वजह से हम सूखी होली खेलने की बात कर रहे हैं हमें चाहिये कि इसमें भावनाओं के कुछ रंग ऐसे मिला लें जो जीवन भर न उतरें( मैं तारकोल ,सिल्वर या ऑइल पेन्ट की बात नहीं कर रही हूँ ) मैं बात कर रही हूँ ऐसे रंगो की जो हमारे मन पर लगे और ताउम्र हमारे जीवन को रंग़ीन बनाए रखें । ये रंग हो सकते हैं आदर के,ख़ुलूस के,अपनेपन,पास-पडौस से दु:ख-दर्द बाँटने के.आप सबको होली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ...

Monday, January 25, 2010

बच्चे का क़ामयाब होना ज़रूरी है या अच्छा इंसान होना ?


एक टीवी शो की प्रतिभागी १२ साल की लड़की ने आत्महत्या कर ली...ये ख़बर सुनी तो मन विचलित हो गया. मन ने प्रतिप्रश्न किया कि हम हमेशा अपने बच्चों में क़ामयाबी ही क्यों तलाशते हैं, इंसानियत क्यों नहीं,सलाहियतें क्यों नहीं,नेकियाँ क्यों नहीं,क्रिएटिविटि क्यों नहीं ?
यह भी विचार विचलित करता रहा कि क्यों हम अपने बच्चे को सर्वगुण सम्पन्न देखना चाहते हैं.उससे अधिक अपेक्षाएं कर के क्या हम उसे उसकी उम्र से बड़ा नहीं बना रहे हैं.उसका बचपन नहीं रौंद रहे हैं.ये तो समझना ही पड़ेगा कि कच्चा मिट्टी का घड़ा अपने पानी नहीं टिका सकेगा.

हम बच्चों से बड़ों जैसी उम्मीदें क्यों करते हैं.उसने कोई ग़लती की नहीं और हम चिल्लाना शुरू कर देते हैं..इतने बड़े हो गए अभी तक अक़्ल नहीं आई तुम्हें.पता नहीं तुम कब समझोगे...कब बड़े और ज़िम्मेदार बनोगे... बच्चो से हम बड़ो जेसी उम्मीदें क्यों करते है ? हम क्यों चाहते है...जबकि हक़ीक़त यह है कि हम भी उसकी उम्र में लगभग वैसी ही हरक़तें या ग़लतियाँ करते थे जैसी वह कर रहा है या कर रही है.
इस बात को ध्यान में रखना ज़रूरी है कि हम अपना प्रारब्ध लेकर आए हैं और वह अपना. अपने प्रारब्ध में उसका प्रारब्ध तलाशना बेमानी है. यह भी सोचियेगा कि आप जो भी हैं आज क्या उसके निशान कल थे...बीते कल आप भी कच्चे ही थे.आते आते ही आपमें एक तरह की गंभीरता आई और ज़िन्दगी को क़ामयाब बनाने का नज़रिया और दृष्टिकोण मिला.

ध्यान रहे बच्चे की प्रतिभा को सहज रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा और वातावरण दीजिये. सिर्फ़ चिल्लाने और क्रोध करने से कुछ नहीं होगा. किसी किसी बच्चे को ज़िम्मेदार बनने में थोड़ा समय लगता है.इस प्रतिस्पर्धी समय में उसे थोड़ा सम्हलने का मौक़ा दीजिये. रियलिटी शोज़ या मीडिया हाइप के दौर में दूसरे क़ामयाब बच्चों को देखकर नाहक अपने बच्चे पर प्रेशर मत डालिये कि तुम्हें भी ऐसा ही बनना है. बच्चे की नैसर्गिक प्रतिभा को देख भाल कर उसे तराशने का ज़िम्मा आपका है. आप घर में ही उसके प्रतिस्पर्धी मन बन जाइये. बच्चे में प्रतिभा ठूँसने की कोशिश मत कीजिये. न पढ़ाई के मामले में , न ही किसी दीगर क्रिएटिव एक्टीविटी में. देखा-देखी के काम ठीक नहीं होते. जो दूसरा बच्चा आज आपको सफल दिखाई दे रहा है, हो सकता है उसमें असाधारण प्रतिभा हो या उसके माता-पिता ने उसकी प्रतिभा निखारने में अतिरिक्त प्रयास किये हों वैसा वातावरण क्रिएट किया हो.

बच्चों की मस्ती,खेल और बेफ़िक्री में अपना बचपन तलाशने की कोशिश कीजिये,आपको भी अपने बच्चे के साथ बच्चा बन जाना आना चाहिये. उसका दोस्त बनना आना चाहिये,उससे बेहतर संवाद स्थापित करना आना चाहिये. सिर्फ़ स्टेटस या अपने मानसिक संतोष के लिये अपने बच्चे को किसी कोचिंग,डांस क्लास या कम्प्यूटर क्लास में भेजना उसका समय और अपना पैसा नष्ट करना ही है. इस ज़बरदस्ती से बड़ा नुकसान यह भी है कि आप अपनी ज़िद के कारण अपने बच्चे को अपने से दूर ही कर रहे हैं.

धीरज रखिये हर चीज़ का समय होता है. जैसे कि फूल के खिलने का या डाली पर फल के पकने का ...बेमौसम पकाए गए या खाए गए फल कभी भी मिठास नहीं देते.आपका संयम,स्नेह, मार्गदर्शन,मित्रता और ज़रूरत पड़ने पर लागू किया गया अनुशासन आपके बच्चे का सुनहरा भविष्य रच सकता है....

Thursday, January 14, 2010

सर्द मौसम...उसकी विवशता ;मेरी विवशता


सुबह उठते ही आज ठण्ड कुछ ज्यादा ही लग रही थी .सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया.जल्दी से स्वेटर ,शॉल डाल कर काम में जुट गई ,बेटी को स्कूल के लिए तेयार जो करना था . मन तो हो रहा था कि सुबह कि गुनगुनी धुप में बैठ कर चाय का आनंद लिया जाए .लेकिन इस आनंद में बेटी कि स्कूल बस छूट जाती .चाहे सर्दी हो या बारिश या गर्मी कुछ काम अनिवार्य होते हैं.. उन्हें मौसम के भरोसे नहीं टाला जा सकता हे.शायद में ग़लत भी हो सकती हूँ. हमने अब ऐसा समाज और परिवेश बना लिया है कि छोटे बच्चों को भी शानदार स्वेटर्स,जर्किन, ज़ुराबें पहनाकर बस में स्कूल रवाना कर देते हैं.अब वो नज़ारे नज़र नहीं आते जब ठण्ड के दिनों में हमारी टीचर हमें बला सी ठंडी कक्षाओं से निकालकर स्कूल के अहाते में गुनगुनी धूप में ले आती थी.किलकती दूप में पकृति कितनी अनोखी गर्माहट बिखेरती थी. यह गर्माहट रिश्तों में भी बड़े प्यार से घुस आती थी और सर्वत्र एक आत्मीय संसार की सृष्टि करती थी.

आज जब बेटी को स्कूल बस में रवाना कर जब मैं घर आई तो किचन में नाश्ते की तैयारी में लग गयी . मन चाह रहा था कि आज धूप का आनंद ले लिया जाए लेकिन अभी तक महरी का पता नहीं था.साढ़े आठ बजे तक वह आई मेरे कुछ कहने से पहले ही वह भी आज ठण्ड को कोसने लगी .मेरे द्वारा गरम चाय देने पर वह काम करते करते ही बताने लगी बीबीजी इतनी ठण्ड में भी घर का सारा काम निपटा कर ,पूरे घर का खाना बनाओ और फिर पैदल पैदल आपके यहाँ काम पर आओ तो देर तो हो ही जाती है न. उसकी बात में बड़ी मासूमियत और ईमानदारी झलक रही थी.हमारे घरों में तो हीटर,गीज़र या गैस जैसे साधन तो हैं नहीं . ठिठुरते हुए ही सारा काम निपटाना पड़ता है हम तो सिर्फ धूप के भरोसे ही अपनी ठण्ड भगाते हैं और काम पर लग जाते हैं.पर बीबीजी इस निगोड़ी धूप से तो चुल्हा नहीं जलता न ?मेरे मन मे उसके देरी से आने के पूर्व उठ रहा ग़ुस्सा काफ़ूर हो गया. सोचा कितनी विवश है यह और उसका परिवार. और हम साधन सम्पन्नलोग भी कितने विवश हैं साधनों के इस्तेमाल के लिये. उसकी विवशता और मेरी विवशता में कितना फ़र्क़ है न ? वे हर लम्हा अपनी थकन मिटाने या साधन जुटाने के लिये प्रकृति के आसरे हैं और हम सब ने अपनी ज़िन्दगी में साधनों ही साधनों का अम्बार लगा लिया है. मैं उसकी बात से सहमति जता कर अपने काम में लग गई.

Thursday, December 24, 2009

बच्चों की परीक्षाओं की तैयारी भी देती है आनंद.


सर्दी ख़त्म होते-होते शादियों का मौसम भी ख़त्म हो जायेगा।बीतते साल की विदाई और नये साल के जश्न भी कुछ दिनों में थम ही जाएंग और एक नए मौसम की तैयारी शुरू हो जाएगी(वैसे तो मौसम चार ही होते हैं, लेकिन एक पाँचवा मौसम भी है जिसे व्यक्ति अपनी सोच से इंज्वाय करता है, जैसे प्यार का मौसम, चुनाव का मौसम, शादियों का मौसम) लेकिन किसी गृहिणी के लिये नज़दीक आ रहा बच्चों की परीक्षाओं का मौसम एक कठित परीक्षा से कम नहीं होता.निसन्देह यह मौसम अन्य मौसमों की बनिस्बत कुछ तनावपूर्ण होता है.लेकिन यह भी सच है कि इस तनाव को टाल कर बाक़ी मौसमों तरह ख़ुशगवार बनाया जा सकता है। इसके लिये कुछ पूर्व तैयारियाँ आवश्यक हैं । बच्चों को सबसे ज़्यादा हिदायतें भी मम्मियों की तरफ़ से ही मिलती है। जैसे सर्दी आने पर ऊनी कपड़ों की सार-सम्हाल शुरू हो जाती है। बारिश में रेनकोट, छतरी बाहर आ जाते हैं। गरमा-गरम पकोड़ों का आनंद लिया जाता है। वैसे ही आनंद हम परीक्षा के दिनों में भी ले सकते हैं।

-परीक्षा की तारीख़ तो निश्चित ही रहती है, वह कोई बिन बुलाया मेहमान तो नहीं कि अचानक आ जाता हो। बच्चें किसी भी उम्र के हों परीक्षा तो सबके लिए एक जैसी है। आप तो जहॉं तक संभव हो बाज़ार के कार्य, ग़ैर ज़रूरी काम इन दिनों न करें।
-मित्रों को पहले से ही सूचित कर दें कि इन दिनों आप फ़ोन पर गॉसिप नहीं कर पायेंगी। माहौल को हल्का-फ़ुल्का बना कर रखें।
-बच्चों के स्कूल कॉलेज से आने के पहले ही घर के कार्य समाप्त करने की हरसंभव कोशिश करें,ताकि बच्चों के साथ आप समय बिता सकें उनकी मदद कर सकें।

-बच्चों को समझाएं कि जैसे पढ़ाई ज़ितनी ज़रूरी है,शारीरिक व्यायाम,खेल और नींद भी उतनी ही ज़रूरी है.

-छोटे बच्चें हों तो उनके लिए विषय से संबंधित तारानुमा कार्ड तैयार करें। उन पर व्याकरण, फ़ार्मूले आदि लिखे जा सकते हैं। खेल-खेल में रिविज़न हो सकता है।

-बच्चों को संतुलित आहार देने की चेष्टा करें.बदलाव के तौर पर ऐसी चीज़ें बनाकर दें जिनसे पेट भी भरता हो लेकिन जो ज़्यादा गरिष्ठ भी न होतीं हों.बच्चों को इन दिनों में जंक फ़ूड या बाहर के खाने से दूर रखें.गर्मियाँ आते ही बच्चों को फ़लों की रस,ठंडाई और लस्सी जैसी चीज़ों का सेवन करवाएं.

-यदि किसी वजह से बच्चे की तैयारी में कोई कमी रह गई है तो उसके दोस्त बनकर उसे समाधान देने की चेष्टा करें.यदि उसकी ट्यूटर के यहाँ जाने और किसी मित्र से बातचीत करने से कोई रास्ता निकल सकता है तो ज़रूर निकालें.कोशिश करें कि अपने बच्चे की तैयारी के बारे में उसके निकट मित्रों से भी चर्चा करते रहें उनके फ़ोन/मोबाइल नम्बर्स आपके पास पहले से नोट करके रखें.

-पतिदेव को कहें कि इम्तेहान की तैयारी के दिनों में ज़्यादा से ज़्यादा समय परिवार के साथ बिताने की चेष्टा करें. घर में इन दिनों में टीवी/मोबाइल/फ़ोन का कम से कम उपयोग करें.पति-पत्नी दोनों मिलकर इन दिनों सामाजिक प्रसंगों और पार्टीज़ को टालें.

-बच्चों को यह अवश्य समझाएँ कि परिणाम से महत्वपूर्ण प्रयास है ईमानदारी के साथ की गई मेहनत का सफल होती है और मेहनत का फ़ल हमेशा ही मीठा होता है। कहीं पढ़ा है "सफलता से ज़्यादा मायने इस बात के हैं कि आप असफल होने पर भी हार नहीं मानते हैं और सफल होने की कोशिश में पुनः लग जाते हैं।

और आख़िर में एक ख़ास बात....बच्चा अच्छा परिणाम तब ही देता है जब वह साल भर पढ़ाई करता हो. ऐन इम्तेहानों के वक़्त पढ़ाई करने से पास तो हुआ जा सकता है श्रेष्ठता हासिल नहीं की जा सकती. लेकिन अब तो आपके पास समय शेष नहीं होता है . अत: नाहक तनाव निर्मित न होने दें और सीमित समय में बच्चा बिना अतिरिक्त तनाव लिये जो भी श्रेष्ठ कर सकता हो उसका प्रयास करें . उसके मित्र बनें,मनोबल बढ़ाएं,उसे हँसाएं और देखें कि आप भी इस काम का आनंद ले रहीं हैं ..और आपका प्यारा बेटा/बेटी भी.

Monday, December 14, 2009

कोई लम्हा कई सदियों को निगल जाता है.

ज़िन्दगी से पलायन बेमानी है. आज ही मेरे शहर के एक परिवार से बुरी ख़बर आई. नौजवान लड़की ने न जाने किस कारण से आत्महत्या कर इस नश्वर संसार से विदा ले ली. छोटे-छोटे बच्चों को छोड़ कर वह कहीं दूर चली गई. शोक बैठक में यदि सबसे ज़्यादा संतप्त दीख रही थी तो उस लड़की की माँ,जो एक कुर्सी पर निढाल से शून्य में देखे जा रही थी. छोटे बच्चे जिनकी परवरिश और पढ़ाई अब नानी के ज़िम्मे आ गई है, वह यह सोच कर दुबरी हुए जा रही है कि इन प्यारे बच्चों को अब एक नई चुनौती के साथ दुनिया का सामना करना सिखाना है. उनकी आँखों से साफ़ दीख रहा था कि जिस बेटी को विदा कर वे लगभग चैन की स्थिति में थीं अब वह चैन दूर भाग गया है. पहले तो अपने आप को इस दु:ख से दूर करने का साज़ो-सामान जुटाओ और बाद में ज़िन्दगी की एक नई पारी की शुरूआत.

मैं ख़ुद एक माँ हूँ,बेटी भी हूँ और पत्नी भी.महसूस करती हूँ कि जीवन के इस महासंग्राम में ऐसे कई मोड़ हैं जब मन अवसाद,उत्तेजना और तनाव से भर जाता है. लगता है सब निरर्थक है. अपनी बात को कोई तवज्जो नहीं दे रहा है. सब अपनी अपनी हाँके जा रहे हैं लेकिन ऐसे में मुझे भी अपने पिता और माँ की नसीहतें याद हो आतीं हैं जिनमें संयम से जीवन को देखने की बात प्रमुखता से कही जाती थी. मैं यह भी महसूस करती हूँ कि हर दम्पत्ति को अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ही तलाशना पड़ता है क्योंकि अलग अलग परिवेश,संस्कार,बोल-व्यवहार और संवाद के मद्देनज़र सबकी समस्याएं भी अलग अलग होतीं हैं और समाधान भी. कोई शास्त्र या नियम ऐसा नहीं जिसका अनुसरण कर अपनी परेशानी को सुलझाया जा सके. एक नारी होने के नाते मैं अपने आप में सबसे बड़ी शक्ति महसूस करती हूँ ...सब्र...मेरा मानना है कि सब्र,धीरज,धैर्य हर एक मुश्किल को आसान कर सकता है. एक घड़ी होती है तनाव की,बस उसे टालना भर पड़ता है. यह समझाना पड़ता है कि आपका जीवन साथी या परिजन इस समय विशेष में अपनी बात मनवाना चाहता है...तो उसे अपने मन की कर लेने दीजिये..उसमें टकराहट, अहंकार या अपमान को इरादतन टालिये...आप महसूस करेंगी कि समय बीत जाने के बाद आपके मन की होने वाली है.

किसी भी नापाक़ घड़ी मे लिया गया एक भावुक निर्णय कितना तकलीफ़देह होता है यह आज मैं उन परिजनों के चेहरे पर पढ़ रही थी जिन्होंने अपनी बेटी को खोया. उस लड़की को जिसे उसके माता-पिता ने बड़े नाज़ों से पाला,सुशिक्षित किया और संसार बसाया ; ऐसे कैसे एक बड़ा निर्णय ले सकती है. मैं मानती हूँ कि आत्महत्या अवसाद की कम और ज़िद की परिणिति ज़्यादा है. नारी को शक्ति के साथ करूणा का पर्याय भी माना गया है . किसी भी निर्णय को लेने के पहले उसका आगापीछा ज़रूर देखा जाना चाहिये और यह भी देखा जाना चाहिये कि अपने बाद अपने पति,परिजनों और बच्चों पर इस निर्णय का क्या असर होने वाला है. एक तात्कालिये निर्णय के बाद के दूरगामी परिणामों पर ध्यान दिया जाना चाहिये. सबसे बड़ी बाद किसी भी अवसाद तनाव की स्थिति गहन हो उसके पहले अपने अभिभावकों,मित्रों,पति के मित्रों से बातचीत बहुत सारी समस्याओं का निराकरण कर सकती है. मैंने शोक-बैठक में किसी को यह भी कहते सुना कि उसका तो समय आ गया था ...लगा कितनी बेकार बात की जा रही है. यह जाना भी कोई जाना है...यह निरा पलायन या अपनी ज़िम्मेदारी से भागना कहा जाएगा....अभी हाल में ही प्रकाशित हुई ख्यात शायर राजेश रेड्डी की नई किताब की एक ग़ज़ल का शेर याद आ गया....

यूँ तो लम्हों को निगल जाती है सदियाँ लेकिन
कोई लम्हा कई सदियों को निगल जाता है

Thursday, November 26, 2009

दुनिया की सारी ख़राबियाँ ज़ुबान के नीचे पोशीदा हैं


आज भाषा को लेकर जो तनातनी हो रही है, उस पर कुछ चिंतन करें तो लगता है कि हम कहाँ जा रहे हैं ? प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार;भावनाओं को व्यक्त करने की विधा ''बोलना '' सिर्फ मानव प्रजाति को ही मिला है.अलग -अलग जगह के लोगों ने इसे अपनी सुविधानुसार विकसित किया है ऐसा करने में न जाने कितने वर्ष लगे होंगे .भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है न की अस्मिता का सवाल. भाषा पर गर्व होना अच्छी बात है मुझे लगता है कि हमें भाषा से ज़्यादा अपनी वाणी पर ध्यान देना चाहिए ,उसे प्रचारित करना चाहिए.वाणी की मिठास ही नफरत के झंझावात को प्यार और भाईचारे की ठंडी बयार में बदल सकती है .”ऐसी बानी बोलिए”... यह मुहावरा -पूरा लिखने की ज़रुरत नहीं है भारत-माता बोलते ही जय की ध्वनि स्वतः निकल जाती है वैसे ही कुछ दोहे ,लोकोक्ति अपने आप ही याद आ जाते है. आज हम हर जगह थैंक यू,प्लीज़ और ,सॉरी कहकर अपना आभार ,भावनाएं ,अफ़सोस आसानी से ज़ाहिर कर देते हैं . मेरा मानना है की भाषा कोई भी हो वाणी एवं लहजा सही होना चाहिए .

एक पारिवारिक मित्र की डायरी में लिखा पढ़ा था कि दुनिया की सारी ख़राबियाँ ज़ुबान के नीचे पोशीदा(दबी या छुपी हुई) हैं.वाणी मनुष्यता का सबसे अहम शस्त्र है, सांत्वना देने,हौसला बढ़ाने,सौजन्य प्रकट करने ,किसी को धन्यवाद देने और किसी के लिए प्रार्थना करने जैसे शुभ कार्यों में वाणी का उपयोग हो तो कितना सार्थक हो . भाषा के साथ भगवान ने हमें विवेक भी दिया है...इन दोनों का संजोग हो जाए तो वाणी अपनी मधुरता को पा लेती है. आइये आज से ही पहल करें...



चलो अल-सुबह घूम आएँ
ताज़ी हवा को हम हैं;ये बताया करें
जो मुफ़्त में मिले गुनगुनी धुप तो
क्यों इसे ज़ाया करें

राह में कोई मिले दर्द से परेशाँ ,
तो क्यों न बाँट लें उसका ग़म
क्या पता कल मौक़ा मिले न मिले
ख़ुद दर्द से परेशाँ हों हम

इबारत रचें कुछ ऐसी
कि जगत में फ़ैले मुस्कान
वाणी से साबित करें हम
मनुष है महान.